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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

यदा पश्यामि कालोऽसौ यथा पश्यामि स क्रमः । प्रौढा नियतिरित्यस्य यत्र पश्यामि तन्नभः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जब मैं देखता हूँ, वह काल है, जैसे देखता हूँ, वह क्रम है और जहाँ मैं देखता हूँ, वह आकाश है । इस तरह इस आत्मा (८) स ऐक्षत लोकान्नु सृजा इति स इमाँललोकानसृजत । स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत” इत्यादि श्रुतियों मेँ एक ही समय में सृष्टि का श्रवण होने से एक क्षण के अन्दर ही दीर्घ काल की कल्पना द्वारा क्रम की उपपत्ति होती है । की प्रौढ नियति प्रवृत्त हुई । कहने का तात्पर्य यह है कि नेत्र आदि इन्द्रियों के बाद देश, काल आदि की दृढ़ नियति भी सम्पन्न हो गई