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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

तुल्यकालमनन्तेऽस्मिन्दृश्यजालावभासने । कथयन्ति क्रमं केचित्केचिन्न कथयन्ति च ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न में आकाशादि क्रम से सृष्टि नहीं होती, किन्तु एक ही समय मे सहसा सम्पूर्ण जयत्‌ का अवलोकन होने लगता है, इसलिए आपका यह विषम दवष्टान्त है, इस आशंका पर कहते हैं / इस अनन्त परब्रह्म परमात्मा में जब एक ही समय में सारा दृश्य-जाल भासने लगता है, तब कोई तो उसमें क्रम का (८) वर्णन करते हैं और कोई नहीं भी करते