Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
यत्पश्यत्यवदाता धीः सोपपत्तिविचारणा ।
न तन्नेत्रैस्त्रिभिः शर्वो नेन्द्रो नेत्रशतैरपि ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्वद्रष्टि ओर योगी की दष्ट की सवोत्कृष्ट रूप से प्रशसा करते है /
शुद्ध बुद्धि उपपत्ति तथा विचारयुक्त होकर जो देखती है, उसे अपने तीनों नेत्रो से न तो
भगवान शंकरजी देख पाते हैं और न अपने हजार नेत्रो से इन्द्र भगवान् ही देख पाते हैं