Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
ततः पश्याम्यहं यावत्संपन्नोऽप्यणुरूपकः ।
चित्त्वाच्चेतस्तदेवाशु तथाभूतोऽस्मि संस्थितः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि
उसके बाद मैं अपरिच्छिन्नस्वरूप रहने पर भी उसके द्वारा की गई परिच्छेद की कल्पना से
परिच्छिन्न बन गया । सच पूछिये तो चितिरूप होने से उस चित्त के ही रूपमें शीघ्र वैसा मैं स्थित
हुआ