Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
यदैव सामला संवित्किंचिदुन्मेषिता स्थिता ।
तदैवाहं क्वचित्तत्र पश्याम्याकाशतामिव ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले (तस्माद्रा एतस्मादात्मन आकाशः सभ्रूतः ' इस शति में प्रतिपादित करम जिसका उपलक्षण
है ऐसे आकाश की कल्पना कहते हैं /
वह निर्मल संवित् मेरे द्वारा ज्यों ही कुछ उन्मेष को प्राप्त होकर स्थित हुई त्यों ही मैं वहाँ कहीं
पर आकाशताका-सा अवलोकन करने लग गया