Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
प्राणान्मे घ्राणतन्मात्रमुदितं व्योमरूपिणः ।
इत्थं न किंचित्संपन्नं सर्वं संपन्नमत्र मे ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण के संकल्प से आकृष्ट प्राणवायु के भेदरूप अपान से प्राणेन्द्रिय
और तन्मात्रा उत्पन्न हुई । इस प्रकार आकाशस्वरूप मुझे देह, इन्द्रिय ओर विषय सम्पत्ति आदि
सब कुछ प्राप्त हो गया । लेकिन वास्तव में कुछ भी नहीं प्राप्त हुआ