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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

मरौ नास्त्येव सलिलं संवित्पश्यति तत्तथा । निर्मूलमन्तःसंतप्ता स्वसंभ्रमवती भ्रमम् ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

मरुस्थल में जल बिलकुल नहीं है, किन्तु बिना कारण के ही अन्तःकरण से क्षुब्ध हो अपने में संभ्रम धारण कर बुद्धि उसमें जल देखती है, लेकिन हे श्रीरामचन्द्रजी, बुद्धि का वैसा देखना वस्तुतः उसका भ्रम है, वह जलको नहीं देखती, बल्कि जलके भ्रम को वह उस तरह देखती है