Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verses 33–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 33,34
संस्कृत श्लोक
एवमिन्द्रियतन्मात्रजालं चेत्तत्र संस्थितः ।
यावत्तावद्विदः पञ्च बलादेव ममोदिताः ॥ ३३ ॥
शब्दरूपरसस्पर्शगन्धमात्रशरीरिकाः ।
अनाकारास्तथा भातस्वरूपिण्यो भ्रमात्मिकाः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर पवो इन्द्रियों की भोयवृत्ति मुझनें जबरदस्ती उदिति हो यह; यह कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह जब सब इन्द्रियाँ और तन्मात्राओं के समुदाय मुझमें स्थित हो गये
तब ये सबकी-सब पाँचों इन्द्रियों की भोग-वृत्तियाँ बलात् मुझमें उदित हो गई । उनका शब्द, रूप,
रस, स्पर्श तथा गन्धमात्र ही शरीर है । वे मिथ्या होने से ही वस्तुतः आकारशून्य हैं, किन्तु
भ्रान्तिवश इनका स्वरूप प्रकाशित होता है