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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । शृणु राम यथापूर्वं स्वयंभूत्वं मया तदा । अनुभूतमसत्सद्वदिदं स्वप्नपुरोपमम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा पूछे गये मतनब को विस्तार के साथ कहने के लिए श्रीवश्तिष्ठजी प्रतिज्ञा करते है। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उस समय मैंने अपने में सत्‌ के तुल्य प्रतीत होनेवाले वस्तुतः स्वप्ननगर के समान असत्‌ इस स्वयंभूरूपता का पहले जिस तरह अनुभव किया, उसका मैं आपसे वर्णन करता हूँ आप सुनिये