Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सुषुप्ताद्विशतः स्वप्नं जगद्दृश्यघनोदयम् ।
यथा तथैव सर्गादौ दुःखं भाति निमेषतः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्हीं विषयों तथा इन्द्रियों के कारण ही पहले दु-खरहित रहनेवाले आत्मा को स्वप्न की तरह
व्यवहार में दुःखो की प्राप्ति होती हैं, यह कहते हैं /
जैसे सुषुप्ति से स्वप्न में प्रविष्ट हो रहे पुरुष को दृश्य के गहन (घने) आविर्भाव से युक्त
जगत् का भान क्षण भर में होता है, वैसे ही सृष्टि के प्रारम्भ में जब दुःखरहित शुद्ध आत्मा
(4) अर्थात् अपनी चलनक्रिया के अनुकूलरूप से दिशाओं का अपने में पर्यालोचन करनेवाला |
इन्द्रियों द्वारा विषयों की ओर (अभिमुख) होता है, तब निमेषमात्र मेँ ही उसको दुःख भासित
होने लगता है