Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
यथोन्मिषति दृश्यश्रीः सुषुप्ताद्बोधमेयुषः ।
जाग्रद्वा विगते स्वप्ने चिन्मात्रस्य स्वचेतनात् ॥ ४ ॥
श्रीराम उवाच ।
आकाशरूप आकाशे परमाकाश कथ्यताम् ।
भूयो निपुणबोधाय कथं सर्गः प्रवर्तते ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी समाधि में उच्च सृष्टि का आपने कैसे अनुभव किया 2 इस्र प्रश्न पर कहते हैं /
जैसे सुषुप्ति-अवस्था से स्वप्नावस्था को प्राप्त चिन्मात्र पुरुष की स्वचेतन से स्वाप्न दृश्य भी
विकसित होता है अथवा जैसे स्वप्नावस्था के हट जाने पर प्रबोध को प्राप्त हुए पुरुष का जाग्रतप्रपंच
विकसित होता है वैसे ही सृष्टि के प्रारम्भ मेँ जिसने अपने स्वरूप का पृथक् रूप से अनुभव किया
है ऐसे आत्मा में यह सृष्टि उदित होती है । हृदयाकाश में हुआ यह सृष्टि का उदय आकाशस्वरूप
से (चिदाकाश से) पृथक् नहीं है