Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 176
एक सो चौहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पचहत्तरवाँ सर्ग जब तक अज्ञान रहता है तब तक चिति ही बिना किसी कारण के जगत् की तरह प्रतीत होती है ।
53 verse-groups
- Verse 1शास्त्र द्वारा अज्ञता के हटने पर वह मुक्त हो जाती है, यह वर्णन । यह सृष्टि और उसकी अस्तित…
- Verse 2स्वप्नसंवित् के रूप से ही जीवत्वसमकालिक सृष्टि आदि की सिद्धि होती है अन्य निमित्त से नही…
- Verse 3चिदाकाश का जीवभाव अथवा जगद्भाव वास्तविक नहीं है, जिससे कि जगत् उसका शरीर होगा, ऐसा कहते…
- Verse 4तो क्या अनुभव भी असत् है ? इस पर नकारात्मक उत्तर देते हैँ । इस तरह जो जगत् के रूप से अव…
- Verse 5यह परमात्मा ही जब तक अज्ञात रहता है तभी तक यह अविद्यारूप मल भासता है । अविद्याअवस्था में…
- Verse 6कारण का संभव न होने से दृश्य की स्वप्नतुल्यता बार-बार सिद्ध की जा चुकी है, उसी को दृढ़ कर…
- Verse 7आकाशभूत चिदाकाशात्मा के स्फुरण की सृष्टिरूपधारिणी पृथिवी आदि कल्पना की गई है तथा मन, बुद्…
- Verses 8–9जल में आवर्त की (भँवर की) तरह और वायु में स्पन्दन की तरह चिदाकाश में बिना भीत का जो जगद्भ…
- Verse 10स्वच्छ से भी अत्यन्त स्वच्छ जो यह महाचिति है वह स्वयं ही जगत् के रूप से स्फुरित होती हे…
- Verse 11हे श्रीरामचन्द्रजी, विचारदृष्टि से तो कुछ भी स्फुरित नहीं होता है, क्योंकि यह महाचिति अत्…
- Verses 12–13शुद्ध संवित् आनन्द स्वरूप चिदाकाश ही चिदाकाश में निर्विकार रूप से ज्यों का त्यों स्थित ह…
- Verses 14–15स्वप्न के समान निर्धर्मकं वह अपने अधिष्ठान से तनिक भी भिन्न नहीं है, इसलिए चिदाकाशरूप से…
- Verses 16–17स्वप्न में अकारण ही इस दुश्यसृष्टि का सकल जीवों को अनुभव होता हे स्वप्न में तो आत्मा ही स…
- Verses 18–19स्वयं चिदाकाश ही वह मन की समष्टिरूप से आकाशात्मक ही इस सकल जगत् का विस्तार करता है और स्…
- Verse 20पृथ्वी आदि से रहित समष्टिमनरूप ब्रह्मा अवयवरहित जिस जगत् के हृदय में स्थित है उससे भिन्न…
- Verse 21एक निराकार परब्रह्म होकर भी अपनी अविद्या से पूर्ण सच्चिदानन्द भाव से च्युत हो मनोभाव को प…
- Verses 22–24यथार्थतः न यहाँ (चित् में) पृथिवी आदि हैं, न शरीर है, न चित् से भिन्न कुछ दुश्यरूप ही ह…
- Verse 25वह प्रबुद्ध (ज्ञानवान्) पुरुषश्रेष्ठ निश्चल होकर अनन्त अपार चिन्मात्ररूप परम इष्ट (परमप्…
- Verse 26इस प्रकार मुक्ति को प्राप्त हुए पुरूषश्रष्ठ के फिर कालान्तर में सृष्टि आदि से बन्धन-प्रसं…
- Verse 27जैसे वायु द्वारा अपने से अभिन्न स्पन्द का अबुद्धिपूर्वक ही निर्माण किया जाता है वैसे ही प…
- Verse 28जैसे वायु का अविनाशी स्पन्दन वायु से अभिन्न है वैसे चिदाभासरूप सब जीव प्रत्यग्रूप परमात्म…
- Verse 29अतएव जीव भी ब्रह्म के पर्यायरूप ही हैं, ऐसा कहते है। हे ज्ञानवानों मे श्रेष्ठ श्रीरामचन्द…
- Verse 30अविद्यावृत ब्रह्म नेत्र के समान उन्मेष निमेषरूप है अथवा वायु के समान स्पन्दअस्पन्दरूप है…
- Verse 31जैसे उन्मेष ओर निमेषकाल में एक-सा नेत्रगोलक एक ही है उसी मे निमेष उन्मेष का लय होता है वै…
- Verses 32–33परब्रह्म परमात्मा निमेष और उन्मेष- दोनों अवस्थाओं में एकरूप ही रहता ह । अतः चिति से ही दृ…
- Verse 34उन्मेष ओर निमेष भी उन्मेष ओर निमेष के हेतु पलक सहित नेत्र स्थानीय शबलब्रह्मरूप से परस्पर…
- Verse 35जैसे आकाश अपने में अध्यस्त नीलरूपता से स्फुरित होता है वैसे ही चिति भी अचित्यात्मकरूप से…
- Verses 36–38न तो दृश्य कभी उत्पन्न हुआ है, न नष्ट होता है ओर न यथार्थतः अनुभव में ही आता है केवल एकमा…
- Verse 39चिदाभास द्वारा जब जिस जिसका जिस प्रकार से-भाव अथवा अभाव रूप से जैसा संकल्प किया जाता है उ…
- Verse 40जगत् की जडता की अन्य प्रकार से उपपत्ति न होने के कारण उसके अनुरूप प्रधान, परमाणु आदि रूप…
- Verse 41ऐसा मानने पर जगत् की, प्रमाणो के अविषय ब्रह्म में अध्यासवश स्वप्न की तरह, अनिर्ववनीयतारू…
- Verses 42–44इसलिए ब्रह्मरसिक लोगों का चित्त जगत् को ब्रह्म ही देखता है यों उन के अनुभव का अनुसरण भी…
- Verse 45जिस जीव का चित्त दृढ़ निश्चयवश जिसमें विश्रान्त हो चुका, उसके लिए वही परमार्थ (सत्य) है,…
- Verses 46–58मेरे द्वारा निर्दिष्ट इस उपाय से (युक्ति से) यदि जगत् का भलीभाँति अवलोकन कीजिये तो यह सब…
- Verse 59स्वप्नपर्वत के तुल्य स्वच्छ दृश्य स्वाधिष्ठान चिन्मात्र से रचभर भी भिन्न नहीं हे, इसलिए च…
- Verse 60सकल रूपों से विरहित सच्चिदानन्दघन जो परम ब्रह्म है वही अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूप से रंचभर…
- Verse 61स्वप्न में दृश्य का सबको अनुभव होता हे । स्वप्न में आत्मा ही नगर आदि के रूप में भासता हे…
- Verses 62–63यदि कोई कहे कि “स एवायं देवदत्तः“ (वही यह देवदत्त है) (तदिदं पूर्वद्ृष्टमेव मद्गृहम्“ (य…
- Verse 64सादृश्य से भी वही यह लहरी है, वही यह दीपशिखा है इत्यादि प्रत्यभिज्ञाभ्रम लोक में प्रसिद्ध…
- Verse 65केवल कल्पनामात्र होने के कारण ही ब्रह्म में "स दाधार पृथिवीं घ्यामुतेमाम्* (उसने इस पृथि…
- Verse 66इसलिए सद् ब्रह्म सर्वात्म है, इसमें क्या नहीं है ? वह ब्रह्मसत्ता ही सर्वात्म है इस कारण…
- Verse 67इस कारण उसमें सकलवादियों की सभी कल्पनाओं का अविरोध से समावेश और कल्पनाविहीन पुरुष का मोक्…
- Verse 68प्रक्रत में दृश्यभ्रम की निवृत्ति का उपयोगी कौन अभ्यास करना चाहिये, यह बतलाते हैं। तत्त्व…
- Verse 69यदि कोई यह शंका करे कि इस शास्त्र के अभ्यास से क्या करना है, योगशास्त्र में प्रसिद्ध चित्…
- Verse 70जैसे चित्त सदा ही संसार से अविनाभावी है वैसे ही दृश्यरूप संसार भी चित्त और शरीर दोनों से…
- Verse 71जैसे कारण के अभाव से (शुक्रास्त, शुक्रोदयआदि कारण न होने से) वायु, स्पंदन और उनसे होनेवाल…
- Verse 72तो चित्त, दृश्य और शरीर इन तीनों का कारण क्या है ? इस प्रश्न पर उसे कहते है । चित्त, दृश्…
- Verse 73यदि कोड कहे कि केवल पढ़ने मात्र से इसका सकल अर्थ कैसे अवगत होगा 2 इस पर कहते है । यदि पदप…
- Verse 74इसलिए भ्रम की निवृत्ति में इसी शास्त्र को असाधारण उपाय आप जानिये । ऐसा ही ज्ञानियों द्वार…
- Verse 75इसलिए इस महाशास्त्र से दो भागों का (पूर्व ओर उत्तर दो भागों का) अथवा एक भाग का (आधे ग्रन्…
- Verse 76यह ऋषि-प्रणीत शास्त्र स्मृतिरूप है और स्मृति का मूल (उद्गम) श्रुति हे । इसलिए श्रुति का ह…
- Verse 77मनुष्य अविचाररूप अनर्थ से अपनी जिन्दगी बरबाद न करे । श्रवण आदि उपाय से उत्पन्न तत्त्वबोध…
- Verses 78–79आत्मज्ञान के विषय में आलसि्यो को प्रोत्साहित करते हैं। आयु के बीते हुए एक क्षण को भी यदि…