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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 36–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 36-38

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

न तो दृश्य कभी उत्पन्न हुआ है, न नष्ट होता है ओर न यथार्थतः अनुभव में ही आता है केवल एकमात्र चिति ही अपने स्वरूप में स्वयं दृश्यरूप चमत्कार करती हे । जैसे सूर्य से निकली हुई सूर्य की दीप्ति से सूर्य की उष्णता भिन्न-सी मालूम होती हुई भी भिन्न नहीं है वैसे ही दृश्य नाम की चिदाकाशरूपी महामणि की प्रभा भी अपने उद्गम स्थान (आकर-स्थान) महामणि से भिन्न- सी प्रतीत होती हुई भी उससे अभिन्न ही हे । जैसे सुषुप्ति ही स्वप्न-सी प्रतीत होती है यानी स्वप्नरूप में भासती है वैसे ही ब्रह्म ही सृष्टि के समान स्फुरित होता है, इसलिए नानारूप के समान स्फुरित होता हुआ भी यह सारा जगत्‌ एक, शान्त, शिवरूप ब्रह्म ही हे