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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । जगत्स्वप्नेषु शब्दार्थसंबन्धोऽवगतस्त्वया । न नाम न च लोकेन व्यर्थं तत्कथनं ततः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्नसंवित्‌ के रूप से ही जीवत्वसमकालिक सृष्टि आदि की सिद्धि होती है अन्य निमित्त से नहीं होती, ऐसा कहते हैं। हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, सृष्टि के आदि में न स्वप्नसंविद्रूप दृश्यमान सृष्टि की सिद्धि होती है और न परलोक की ही सिद्धि होती है