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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अणावणावसंख्यानि तेन सन्ति जगन्ति खे । तेषां तान्व्यवहारौघान्संख्यातुं क इव क्षमः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

कारण का संभव न होने से दृश्य की स्वप्नतुल्यता बार-बार सिद्ध की जा चुकी है, उसी को दृढ़ करने के लिए पुनः अनुवाद करते हैं। जो यह शुद्ध संवित्‌ है वही स्वप्ननगर है और वही सृष्टि के आदि में जगत्‌ है, अतः पृथिवी आदि का संभव कैसे हो सकता है ?