Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 67
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 67
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इस कारण उसमें सकलवादियों की सभी कल्पनाओं का अविरोध से समावेश और कल्पनाविहीन
पुरुष का मोक्ष भी उपपन्न होता है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
क्रीड़ा के लिए भ्रमण कर रहे बालक की दृष्टि में वृक्ष, पर्वत, नदी आदि के समूह के साथ भूमि का
भ्रमण होता है अन्य लोगों की दृष्टि में भूमि भ्रमणशील नहीं है। दोनों ही दृष्टियाँ सदात्मक हैं। भ्रमावस्था
में भूमि नहीं घूमती है ऐसा ज्ञान रखनेवाले भी बालक को जब तक स्थिरता का अभ्यास नहीं होता तब
तक पहले गृहीत भूभ्रमणदृष्टि शान्त नहीं होती है वैसे ही भ्रमावस्था में जगद्भ्रान्ति दृष्टि भी स्थिरता
के अभ्यास के बिना शान्त नहीं हो सकती है