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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 14–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

अहंकारस्त्वहंबुद्धिरित्येवापश्यदात्मनि । एकनिश्चयनिर्माणमयी मायानुरूपिणी ॥ १४ ॥ बुद्धिर्मनोहमित्येवं स्वप्ने पश्यदसन्मयम् । नमयन्त्यात्मनात्मानमविकल्पं विकल्पनैः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न के समान निर्धर्मकं वह अपने अधिष्ठान से तनिक भी भिन्न नहीं है, इसलिए चिदाकाशरूप से परिशिष्ट वह आकाश से शून्यता के समान चिदाकाश से भिन्न नहीं हे। जो ही सकलरूपों से विवर्जित अद्वितीय पर ब्रह्म है वही अपने सच्चिदानन्दघन अद्वितीय रूप से ही स्थित हो स्वमायाशक्ति से सकल जगद्रूप से स्थित है