Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 62–63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 62–63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 62,63
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि “स एवायं देवदत्तः“ (वही यह देवदत्त है) (तदिदं पूर्वद्ृष्टमेव मद्गृहम्“ (यह वही
पूर्वदष्ट मेरा घर है) इत्यादि अबाधित प्रत्यभिज्ञा आदि से स्वप्न में भी पदार्थ सत्य हों ? इस शंका पर
कहते हैं।
स्वप्न में वही यह रेखा है" इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा का विषय हो रहे गृह आदि पदार्थ का हृदय, कण्ठ,
नाड़ी छिद्र आदि प्रदेश में किसी प्रकार भी संभव न होने से प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, पदार्थ का संभव
न होने के कारण इन तीनों का त्याग कर ब्रह्मसंवित् का ही निद्रा आदि दोषों से स्वाप्न पदार्थ के रूप से
अन्यथाभान होता हे उसी में जाग्रत्-दृष्ट पदार्थो की तुल्यता की कल्पना कर अनुभव के व्यवहाराभास
की तरह स्मृति आदि के सादृश्य की भी कल्पना कर उसमें स्मृत्यादिता भी मूढं ने मानी है, ऐसा
समझना चाहिये