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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 65

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 65

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

केवल कल्पनामात्र होने के कारण ही ब्रह्म में "स दाधार पृथिवीं घ्यामुतेमाम्‌* (उसने इस पृथिवी और द्युलोक को धारण किया), “यस्मिन्‌ दयौः पृथिवीचान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणेश्व सर्वँस्तमेवेकं जानथ आत्मानम्‌“ (जिसमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष सब प्राणो के साथ मन ओत-प्रोत हो केवल उसी को आत्मा जानो) इत्यादि जगत्‌ की विधिर्यो ओर नेह नानास्ति किंचन“ (यहाँ भेद कुछ भी नहीं है) इत्यादि जगन्निषेध समानरूपे समावेश पाते हैं, ऐसा कहते है । परस्पर सदा ही सभी विधिर्यो ओर निषेध अलग अलग (विभक्त) होकर ओर मिलकर परम ब्रह्म में हैं और नहीं भी हैं