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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

अथ प्रत्येकमत्रापि नवरङ्गमनोहरम् । त्रिजगद्वेत्ति हृदये स्वादर्श इव बिम्बितम् ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी आदि से रहित समष्टिमनरूप ब्रह्मा अवयवरहित जिस जगत्‌ के हृदय में स्थित है उससे भिन्न के तुल्य त्रिजगत्‌ के रूप से भासता है जैसे कि स्वप्न में निराकार चिदात्मा स्वाप्न पदार्थ के रूप से भासित होता है