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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 22–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 22–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 22-24

संस्कृत श्लोक

अविद्येयमनन्तेयमविद्यात्वेन चेतिता । ब्रह्मत्वेन परिज्ञाता भवति ब्रह्म निर्मलम् ॥ २२ ॥ एवं द्रष्टापि यः स्वप्नजालं दृष्टे न किंचन । कोऽत्र द्रष्टा कुतो दृश्यं क्व द्वैतं क्व च कारणम् ॥ २३ ॥ सर्वं निःशान्तमाभातं खात्म निर्भित्ति केवलम् । ब्रह्मात्मनि स्थिते स्वच्छमाद्यन्तपरिवर्जितम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

यथार्थतः न यहाँ (चित्‌ में) पृथिवी आदि हैं, न शरीर है, न चित्‌ से भिन्न कुछ दुश्यरूप ही है, किन्तु एकमात्र चिदाकाश ही कल्पित समष्टि मनोरम हो जगद्रूप मेँ अतिशयरूप से स्फुरित हो रहा हे । और सूक्ष्म विचारदृष्टि से यह जगत्‌ का स्फुरण भी कुछ नहीं है एकमात्र अत्यन्त घन चिन्मात्र ही अपने आप अपने स्वरूप में भासता है । जिससे वचन निवृत्तहो जाते हैं यानी जहाँ मन और वाणी की पहुँच नहीं है उस निरतिशय आनन्द की प्राप्ति से तूष्णीभाव (आत्मस्वरूप निश्चलता) शेष रहता है । वह निश्चलता व्यवहारकाल में भी नहीं हटती। शुद्ध सच्चिदात्मा संसार के व्यवहारो मे निरत रहने पर भी निश्चल आत्मस्वरूप से ज्यों का त्यों मूकवत्‌ स्थित रहता हे