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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 18–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

अनेकभूतकलितं नानावयवरजङ्गमम् । कलनाकालकलितं कल्पितान्योन्यसंगमम् ॥ १८ ॥ स्वप्ने प्रत्येकमेवात्र पश्यत्यादर्शबिम्बितम् । इव त्रैलोक्यनगरं नवरङ्गमनोहरम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वयं चिदाकाश ही वह मन की समष्टिरूप से आकाशात्मक ही इस सकल जगत्‌ का विस्तार करता है और स्वयं अविकारी होता हुआ भी विकारी जगद्रूप-सा प्रतीत होता है । मन ही हिरण्यगर्भ है वह सृष्टि के हृदय में स्थित होकर सबका निरन्तर निर्माण करता है और निरन्तर सबका संहार भी करता हे