Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 40
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
जगत् की जडता की अन्य प्रकार से उपपत्ति न होने के कारण उसके अनुरूप प्रधान,
परमाणु आदि रूप कारण की कल्पना करो तो स्वप्न में प्रतीत होनेवाले प्रपंच का प्रधान, परमाणु
आदि द्वारा कदापि निर्वाह नहीं हो सकता, आतएव आत्मा का ही जगद्भाव मानने पर तो उसी न्याय
से सृष्टि के आदि में भी ब्रह्म ही जगत वेष धारण करेगा । इससे प्रधान, परमाणु आदि की कल्पना
ठीक नहीं है, यह भाव है