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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

स्वप्ने चिन्मात्रमेवाद्यं स्वयं भाति जगत्तया । यथा तथैव सर्गादौ नात्रान्यदुपपद्यते ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यह परमात्मा ही जब तक अज्ञात रहता है तभी तक यह अविद्यारूप मल भासता है । अविद्याअवस्था में संसारी हो रहा जीव-सा पृथक्‌ होता है किन्तु ज्ञात होकर वह मल परम निर्मल ब्रह्म ही है, क्योकि “स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (जो उस परम ब्रह्म को जानता है वह ब्रह्म ही होता है) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । ब्रह्मभाव में मल का प्रसंग ही नहीं हे । अनादिनिधन परमाकाश में मल कहाँ से हो सकता है, क्योकि प्रबोध से स्वप्न की तरह ज्ञान होने से मल का बाध हो जाता है