Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 34
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उन्मेष ओर निमेष भी उन्मेष ओर निमेष के हेतु पलक सहित नेत्र स्थानीय शबलब्रह्मरूप से परस्पर
अभिन्न ही है, ऐसा कहते हैँ ।
निमेष उन्मेष से अतिरिक्त नहीं हे ओर उन्मेष भी निमेष से भिन्न नहीं है वैसे ही मायाशबल ब्रह्म से
उन्मेष-निमेषरूपी सर्ग ओर प्रलय भिन्न नहीं है ॥३ ३॥
इस दृष्टि से जो सिद्ध हुआ, उसे कहते हैं।
हे सौम्य श्रीरघुनायक, इस कारण निमेष ओर उन्मेष में साधारण (एक समान) ब्रह्मरूप से एकरस
यथास्थित इस जगत् को आप अनुत्पन्न, अजर, अमर, शान्त चिदाकाश ही जानिये