Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 42–44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 42–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 42-44

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसलिए ब्रह्मरसिक लोगों का चित्त जगत्‌ को ब्रह्म ही देखता है यों उन के अनुभव का अनुसरण भी हो गया, यह कहते हैं। जिसका चित्त जिस ओर रसिक रहता है उसका चित्त वैसा ही अनुभव करता है इस कारण एकमात्र ब्रह्म मेँ रसिक तत्त्वज्ञचित्त जगत्‌ की ब्रह्मता का अनुभव करता है । जिस मनुष्य के चित्त- प्राण सदा जिस पर अनुरक्त रहते हैं, लगे रहते हैं, वह उसको वास्तविक (सत्य) प्रतीत होता है अतएव उसी का स्पष्टरूप से वह अनुभव करता है । जो मन एकमात्र ब्रह्म में रसिक होता है वह क्षणभर में ब्रह्म बन जाता है अतः जिसका मन जिसमें रस पाता है उसने उसी पदार्थको यथार्थ (सत्‌) जाना है