Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 16–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
अपश्यत्तन्मनः स्वप्ने देहे पञ्चेन्द्रियं ततः ।
अनाकारं घनाकारं स्वप्नाद्रित्वमिवाज्ञधीः ॥ १६ ॥
ददर्श स मनोदेहो वपुस्त्रिभुवनात्मकम् ।
स्वात्मा स्वात्मैव निर्भित्ति भित्तिभासुरमाततम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न में अकारण ही इस दुश्यसृष्टि का
सकल जीवों को अनुभव होता हे स्वप्न में तो आत्मा ही स्वप्न के सकल पदार्थो का रूप धारणकर
भासित होता है, अतः जाग्रत् में भी एक ज्ञानरूप निर्मल ब्रह्म ही जगद्रूप से (नानापदार्थो के रूप से)
भासता है ब्रह्म ही चिद् होने से आत्मा में मानों जीवत्व की कल्पना करता हुआ ओर अपने निर्मल
सच्चिदानन्दघन स्वरूप का त्याग न करता हुआ मनस्त्व को जैसे प्राप्त होता है