Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verse 77
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verse 77 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 77
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
मनुष्य अविचाररूप
अनर्थ से अपनी जिन्दगी बरबाद न करे । श्रवण आदि उपाय से उत्पन्न तत्त्वबोध से सम्पूर्ण दृश्य
को आत्मसात् करना चाहिए, बाधपूर्वक आत्मा द्वारा ग्रास करने योग्य बनना चाहिये | यहाँ पर दिये
त्रच" इस सूत्र से साति प्रत्यय है जैसे कि ब्राह्मणसादिदमन्नं कर्तव्यम्” यहाँ पर है