Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 78–79
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 78–79 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 78,79
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
आत्मज्ञान के विषय में आलसि्यो को प्रोत्साहित करते हैं।
आयु के बीते हुए एक क्षण को भी यदि कोई चाहे सुवर्ण आदि की राशि के साथ सकल रत्नों
से लौटाना चाहे, वापस पाना चाहे तो पा नहीं सकता। ऐसी दुर्लभ आयु को जो वृथा गँवाता है उसके
प्रमाद का क्या ठिकाना है । उसके लिए खेद है, महाखेद है । प्रत्यक्ष अनुभूत भी, अन्तःकरण से
उपहित भी तथा स्वप्न में दैवात् दृष्ट अपने मरण पर चारों ओर बान्धवों द्वारा किये गये विलाप की
तरह सत्-सा स्फुरित भी यह दृश्य सत् नहीं है, निपट मिथ्या ही है । ऐसा ब्रह्मअद्बैत का दिग्विजय
का डिंडिमघोष हे