Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 176, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 176 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

सोऽपश्यदात्मना स्वप्न इव जीवत्वमात्मनि । शून्यरूपमिवाकाशं पवनः स्पन्दनं यथा ॥ १२ ॥ आकाशरूपमजहदेव जीवस्ततः स्वयम् । अपश्यदहमित्येव रूपमाकाशरूपकम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

शुद्ध संवित्‌ आनन्द स्वरूप चिदाकाश ही चिदाकाश में निर्विकार रूप से ज्यों का त्यों स्थित होकर भी अज्ञात होने से स्वप्न की तरह चित्त-सा दृश्य-सा अवभासित होता है। सद्‌ कारण के अभाववश अन्य प्रकार से हजारों वादी भी सृष्टि का उपपादन नहीं कर सकते हैं, अतः सृष्टि के आदि में आत्मा ही दृश्य का रूप धारण कर स्वयं चिदाकाशरूप दृश्य को देखता है