Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 116
एक सौ चौदहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पन्द्रहवों सर्ग चारों दिशाओं में वन, पर्वत, वृक्ष, नदी, समुद्र, वायु, पशु-पक्षी, मेघ आदि का वर्णन।
54 verse-groups
- Verse 1पार््वचरों ने कहा : हे उदाराशय, जिनकी ललनाएँ विहारक्रीडाओं में सदा आसक्त रहती हैं, ऐसे कि…
- Verse 2अत्यन्त ऊँचे भी पर्वत दूर से दिखाई देने के कारण बहुत छोटे मालूम होते हैं ऐसा कहते हैं / म…
- Verse 3राजन्, देखिये, ये कुलशैल, दूर से देखने पर जिनके मध्यवर्ती मार्गसमूह दूसरों को नहीं दिखाई…
- Verse 4हे राजन्, सामने दसों दिशाएँ, जिन्होंने चारों ओर पहाड़ों की चोटियों पर मेघों को फैला रक्ख…
- Verse 5ताड़, तमाल, मौलसिरी के पेड़ों से भरे हुए ऊँचे-ऊँचे पर्वत- शिखरों से युक्त दूर से शिखरों क…
- Verse 6इसमें भगवान् शेषशायी सोते हैं, इसमें उनके शत्रुओं का (असुरों का) निवास है, इसीमें इन्द्र…
- Verse 7कोई दूसरा पार्श्चर उत्तर दिशा की ओर मुज़े हुए विपश्चित् से मेरू की तराई में छुव्णमिय जम्…
- Verse 8इस पर्वत की मेचसदृश कदम्बवनरूपी कम्बल को धारण कर रही सूर्य के मार्ग को चूमनेवाली शिखर भूम…
- Verse 9दस्य पाश्वचर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित विपश्चित् से मलयाचल का वर्णन करते हुए बोला / महा…
- Verse 10इस मलयाचल पर्वत ने, जिसके सागर से धोये गये सुवर्णमय तटों पर उगे हुए चन्दन वृक्ष साँपों से…
- Verse 11यह क्रौचाचल पर्वत है । इसमें रहनेवाले कौए निकुंजों, शिलामय प्रदेशों (पथरीली भूमिय), गुफाओ…
- Verse 12हे राजन्, यहाँ इस क्रौंचाद्रि के तटपर कोमल कनकलता से निर्मित निकुज में कान्त के साथ क्री…
- Verse 13हाथियों के गण्डस्थलं से चुए हुए मदजलों से मिश्रित अतएव चंचल भ्रमर-वृन्द द्वारा चवाया हुआ…
- Verse 14कोई पार्श्वचर सागर में प्रतिविग्बित चंचल वन््रविम्ब को दशाति हुए कहता हैं / हे राजन्, अम…
- Verse 15दस्य कोड पार्शचर मलय पर्वत पर राजा को लतानृत्य दिखलाता हैं / निर्मल मलयपर्वत शिखर में बाल…
- Verse 16कोर्ड तीन उत्तम मोतियों की खानों और उनमें से उत्तम मोतियों की उत्पत्ति का वर्णन करता हैं…
- Verse 17इसी प्रकार रत्नों की भी विभिन्न आयारें में (खानो में) उत्पत्ति और विभिन्न गृण और कार्य्र…
- Verse 18कोई दूसरा पार्श्वचर चन्द्रोदय के समय नगर में हर्षवक्श हुए खिड़की आदि से जनघोष और मन्दर पर…
- Verse 19करोड हिमालय के तटों से मेघों की उड़ान में पवन द्वारा किये गये शिखरहरण की तथा भूमि से उठे…
- Verse 20हे राजन्, गंगातरंग ओर हिम-कणो से शीतल महेन्द्र पर्वत के तटों को देखिये इनके सुन्दर शिलात…
- Verse 21युण्यतम प्रदेश, वन, तीर्थ आदि के दर्शन से दुभाग्यिनिव्र्तिरूप महन् फ़ल है, एसा कहते है/…
- Verse 22दिशाओं के मध्यवर्ती अवकाश को पाट देनेवाले, मेघ, गुफा और निकुंजों से परिपूर्ण आकाशतुल्य पर…
- Verse 23राजन्, मलयाचल में चन्दनवृक्षों की मनोहर श्रेणियाँ हैं, विन्ध्याचल में मतवाले हाथी हैं, क…
- Verse 24मेघरूपी अन्धकार से आवृत ये दिशाएँ प्रलय काल में जल से व्याप्त अन्तरिक्ष लोक तक भरे जगद्रू…
- Verse 25स्वयं हिमकणो से लदे हुए, भूमिस्थित तुषारपंक्ति को शोषण द्वारा हल्की बनानेवाले जलधारा वषनि…
- Verses 26–27अहा, नीले बादलों का पीछा करनेवाला यह धीर वायु बह रहा है । यह पेड़ के पल्लव और फूलों के गु…
- Verse 28जैसे स्वर्ग से च्युत हुए जीव पूर्व पुण्यवासना के लेश को धारण करते हैं वैसे ही सुरत से क्ल…
- Verse 29जैसे फूलों की विविध विचित्र पंक्तियों से सुसज्जित (फूलों से सजाये गये) राजा के आँगन में म…
- Verse 30ये पर्वत-शिखर के वायु कहींपर फूलों की सुगन्धि से भरे हैं तो कहीं पर विविध कमलो की भीनी-भी…
- Verse 31कहींपर सूर्य मूर्खो की कुसंगति में पड़ पुरुष की नाई सेवकों की भाँति आज्ञाकारी सूर्यकान्तम…
- Verse 32पुरुषरूप (संगम द्वारा आस्वादनीय) रसायन में अतृप्त अतएव मदवश लज्जारहित महिला द्वारा शरीर स…
- Verse 33कमलो की सुगन्धि से परिपूर्ण, शीतल जलकणों से लदे हुए, चन्द्रकिरणों के समूह की तरह स्वच्छ ल…
- Verses 34–35हे राजन्, इस पूर्वसागर के तटरूप निचली भूमि में कासे के कड़े पहनी हुई बड़े-बड़े पत्ते रूप…
- Verse 36यह महिला विलक्षण सुरतानन्द को देनेवाले मदसंभोग से युक्त रात्रि के बीतने के भय से दुःखी हो…
- Verse 37यहाँ दक्षिण महासागर के तीरपर इस वनपंक्ति को, जिसमें किंशुक के पेड फूले हैं, अतएव जो जली ह…
- Verse 38फूले हुए किंशुकवृक्षों से भरी हुई इस वनपंक्ति से धूम्र के समान काले-काले ऊपरी भाग से युक्…
- Verse 39जिसमें सच्ची आय नहीं थी, किन्तु किंशुक एलरूप कल्पित आय थी, ऐसी वनपंक्ति को दिखलाकर उस ओर…
- Verse 40राजन्, क्रौंचाचल की भूमि में मन्द-मन्द चलनेवाले मेघवृन्द के गंभीर और तेज गर्जनों से नाच…
- Verse 41यह सूर्य का रथ अस्ताचल पर्वत में ऊँचे नीचे सुवर्ण मय शिखरों की नोकों से टकराने के कारण सु…
- Verse 42भुवनरूपी भवन के प्राकार (प्राचीर) रूप उदयाचल पर्वत के शिखरपर चन्द्रमारूपी मांगलिक फूल मंग…
- Verse 43यह चन्द्रमा की चाँदनी प्रदोषकाल में नाच रहे त्रिभुवन संहारकारी शिवजी का अइहास है या भुवनर…
- Verse 44सन्ध्या के धातुरोगों से मिश्रित प्रदोषमय मन्दर से मध्यमान चन्द्रमारूपी क्षीर सागर उछले हु…
- Verse 45हे अनुपम, ताल के वृक्षों के तुल्य कराल वेतालों के बच्चों से परिवृत ये गुह्यकगण रात्रि के…
- Verse 46आकाश में पूर्ण चन्द्रमा तभी तक शोभा पाता है जबतक कि वधू का मुँह घर के बाहर खुले आँगन में…
- Verse 47करोड अन्य पार्श्वचर वन्द्रकिरणो से व्याप्त हिमालय के शिख का वर्णन करता है / ये हिमालय पर्…
- Verse 48पारिजात के वक्षो से विभूषित यह मन्दराचल, जिसका पवन झूल रही अप्सराओं के गीतों को फैलाता है…
- Verse 49खिले हुए और फूलों से भरे हुए कुकुरमुत्तारूप पुष्पपूर्ण अर्घ्यपात्रं को धारण करनेवाले महान…
- Verse 50यहाँ से उत्तर की तरफ प्रसिद्ध कैलासपर्वत पर दृष्टिपात कीजिये जिसके चारों ओर व्याप्त हुए व…
- Verse 51राजन्, कौतुकी इन्द्र कुल्हाडों से जिनकी शाखाएँ कट गईं है ऐसे /ूँठ और अग्नि द्वारा जिनकी…
- Verse 52महाराज, देखिये ये विविध प्रकार के कदम्बो ओर कुन्दो से सुगन्धित वायु मकरन्द की (फूलों के र…
- Verse 53वर्षा ऋतु में कलियों की विकसित पंखुडियों से सुशोभित वनस्थलिया में छायादार वृक्षो के झुण्ड…
- Verse 54यह सामने के गाँव, जिसके आँगन झरोखों तक आई हुई लताओं से वेष्टित महान् घरों के मध्य में तो…
- Verse 55महाराज, देखिये ये पर्वत के रमणीय ग्राम हैं, इनमें खिली हुई निर्मल चम्पक वृक्षों की लता के…
- Verses 56–81वायुवश हिल रहीं लाल, पीले और हरे पत्तोवाली छोटी -छोटी लताओं से इनके हरे-भरे मैदान भरे है,…