Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
जगतां यत्र लक्षाणि न भवन्त्युद्भवन्ति च ।
तच्छून्यमुच्यते व्योम धिक्पाण्डित्यमखण्डितम ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वयं हिमकणो से लदे हुए, भूमिस्थित तुषारपंक्ति को शोषण द्वारा हल्की बनानेवाले
जलधारा वषनिवाले तथा मेघो को मतवाले बना रहे शीतस्पर्श से शरीरों मे प्रचुर रोमांच पैदा करनेवाले
ये वर्षाऋतु के वायु सय साँय बहते हैं