Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
एते कचन्ति शरशक्तिगदाभुशुण्डीशूलासिकुन्तपटुतोमरचक्रपूर्णाः ।
तापाः सताण्डवकचप्रचले चलेऽब्धौ देहेन वल्गति भुवीव फणीन्द्रसंघाः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई दूसरा पार्श्चर उत्तर दिशा की ओर मुज़े हुए विपश्चित् से मेरू की तराई में छुव्णमिय
जम्बूनदी के तर्टो को दिखलाता हुआ कहता हैं /
ये जम्बूनदी के तट, जिनमें सब गाँव, वन, नगर, उपवन, पर्वत, वृक्ष,ठूँठ और विप्रों को दिये
गये ग्राम सुवर्णमय हैं, सूर्य की किरणों से व्याप्त होकर चारों ओर जगमगाते हैं । तथा ज्वालाओं की
पंक्तियों से वेष्टित आकाश में पहुँचकर चारों ओर दीप्तियों की बौछार करते हैं । हे महाराज, यहाँ
पर इस प्रकार की यह सारी भूमि देवताओं के उपभोग योग्य है, मनुष्यों के आवास योग्य नहीं
है