Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
नैर्घृण्यमस्थैर्यमथाशुचित्वं रथ्याचरत्वं परिकुत्सितत्वम् ।
श्वभ्यो गृहीतं किमु नाम मूर्खैमूर्खेभ्य एवाथ शुना न जाने ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सामने के गाँव, जिसके आँगन झरोखों तक आई हुई लताओं से वेष्टित
महान् घरों के मध्य में तोरई के फूल ओर केसरो को ला रहे वायुओं से घुटने तक फूलों से भरे हैं,
वनदेवताओं के नगर-से मालूम पडते हैं