Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verses 26–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
व्योमन्येव प्रलीयन्ते व्योमतः प्रोद्भवन्ति च ।
गच्छतोन्मत्ततामेतामीश्वरान्यभिदा कृता ॥ २६ ॥
आयान्ति यान्ति निपतन्ति तथोत्पतन्ति सर्गश्रियः कणघटा इव पावकोत्थाः ।
यत्रामलं तदहमेकमनादिमध्यं मन्ये खमेव न तु कारणमीश्वराख्यम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
अहा, नीले बादलों का पीछा करनेवाला यह धीर वायु
बह रहा है । यह पेड़ के पल्लव और फूलों के गुच्छं को बिखेर रहा है, अंकुर और पेड-पौधों के
वनों के अन्दर संचार से भला लगता है एवं मूसलाधार वृष्टि के जलकणों से अत्यन्त ही सुहावना
है