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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

वस्त्वस्थानगतं सर्वं शुभमप्यशुभं भवेत् । दुर्मेघं स्थानमासाद्य वारि त्वसिततां गतम् ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, देखिये ये विविध प्रकार के कदम्बो ओर कुन्दो से सुगन्धित वायु मकरन्द की (फूलों के रसकी ) वर्षा से खूब घन, भ्रमरराशि से काले ओर मेघ के सदृश बनकर तथा सब तरही की सुगन्धियों से सनकर जैसे मेघ आकाश को व्याप्त करते हैं वैसे ही लोगों की नाक को व्याप्त कर रहें हैं