Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
स्फाटिकस्तम्भसंभाररम्यनिर्झरवारिणि ।
नृत्यन्त्येताः शिखण्डिन्यः पश्यास्मिन्ग्रामगह्वरे ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
करोड अन्य पार्श्वचर वन्द्रकिरणो से व्याप्त हिमालय के शिख का वर्णन करता है /
ये हिमालय पर्वत के विशाल हिमाच्छन्न शिखर हैं । ये चन्द्रकिरणरूपी नूतन वस्त्र पहने हैं,
गंगा के प्रवाह से इनकी शिलाएँ हिल रही हैं तथा बड़ी-बड़ी लताएँ इनकी जटा-सी मालूम हो रहीं
हैं