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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

गुणैः कतिपयैरेव बहुदोषोऽपि कस्यचित् । उपादेयो भवत्येव शौर्यसंतोषभक्तिभिः ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, देखिये ये पर्वत के रमणीय ग्राम हैं, इनमें खिली हुई निर्मल चम्पक वृक्षों की लता के झूलों में ललनाएँ क्रीडा कर रही हैं, रने का जल इर इर ध्वनि कर रहा है, सीमाओं में चारों ओर ताड के वृक्ष फूले हैं, विकसित चटकीली मंजरियों से अलंकृत लतागूहों में मयूर नाच रहे हैं तथा चारों ओर ऊँचे-ऊँचे प्राचीर या वृक्षों पर मेघ लटके हैं