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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

यत्रानेकसुरासुरास्पदघटा तारापदेशं गता ऋक्षाणां च यदास्पदं विसरतां सर्वोन्नतानां च यत् । तस्मिञ्छून्यमिति प्रतीतिरधुनाप्यस्तं गता नाम्बरे कोऽन्यो मार्जयितुं जनोऽज्ञरचितं लोकापवादं क्षमः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

दस्य पाश्वचर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित विपश्चित्‌ से मलयाचल का वर्णन करते हुए बोला / महाराज, समीप में दिखलाई दे रहा यह मलयाचल है, इसके प्रभाव का क्या बखान करें, श्रेष्ठ लवलीनलताओं से विभूषित चन्दन -वृक्षो की प्रचुर मनोहर सुगन्धि से इसके ओर वृक्ष के भी चन्दन बन जाते हैं, देवता, असुर और मनुष्य उनका मुखकमल में भृग के तुल्य तिलक लगाते हैं और इसकी मनोहर सुगन्धि से भगवान्‌ शिवजी के कपोलों में गर्मी पैदा करनेवाले ताण्डव नृत्य में उत्पन्न हुए गरम स्वेदबिन्दु स्त्रियों के सुरतश्रम से उत्पन्न स्वेदबिन्दुओं की भाँति अत्यन्त शीत बनाये जाते हैं