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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

आकाश काशमसि निर्मलमच्छमुच्चैराधार उन्नततयोत्तममुत्तमानाम् । त्वामेत्य किंतु विरलं करकाघनोऽयं लोकं विमर्दयति तेन परोऽसि नीचैः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

दस्य कोड पार्शचर मलय पर्वत पर राजा को लतानृत्य दिखलाता हैं / निर्मल मलयपर्वत शिखर में बाललताएँ नाचती हैं देखिये, मतवाले कोकिलों की मीठी तान ही इनका पंचमस्वर है, चंचल भ्रमरवृन्द ही इनके नयन हैं, नूतन कमलरूपी हाथों में उन्होने फूल ले रक्खे हैं और वसन्तोत्सव के विलासरूप पुष्पपरागों का तिलक लगा रक्खा है