Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
हस्तस्थितासिवरनीलसरोजदामश्यामो हयोत्थघनरेणुनिशागमोऽत्र ।
आलोकय क्रमणमेष कथं करोति प्रोन्नामहेतिभरभूषणभाजि लक्ष्म्याः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसमें
भगवान् शेषशायी सोते हैं, इसमें उनके शत्रुओं का (असुरों का) निवास है, इसीमें इन्द्र के भय से
शरण में आये पर्वत निर्भय होकर सोते हैं, इसीमें वडवानल भी प्रलयकालीन मेघों के साथ वास
करता है । ओह ! सागर का शरीर कितना विस्तीर्ण, कितना बलवान् और कितना भारसहिष्णु है।
शायद ही इसके समान विस्तृत, बली और भारसह दूसरा हो