Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
पार्श्वस्थचारुशशिमण्डलमण्डनेषु विश्रान्तवारिगुरुवारिदवारणेषु ।
ग्रामेषु या गिरितटेषु विलासलक्ष्मी राज्येषु सा विभववत्सु कुतो विरिंचेः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
सन्ध्या के धातुरोगों
से मिश्रित प्रदोषमय मन्दर से मध्यमान चन्द्रमारूपी क्षीर सागर उछले हुए दुग्धतरंग खण्ड ऐसे फैल
रहे प्रभाजालों से, जो शिवजी द्वारा छोड़ी गई गंगाजी के फैल रहे प्रवाह जैसे स्वच्छ हैं, परिपूरित
अवयव वाली दिशाओं को देखिये