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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

नित्यं स्नासि सुतीर्थवारिविसरैरुच्चैःपदस्थोऽम्बुदः शुद्धः सन्विपिनावनौ निवससि प्रारब्धमौनव्रतः । रिक्तस्याप्यतिकान्तिरेव भवतः कायाश्रया लक्ष्यते प्रोत्थायाशनिमातनोषि किमिदं तुच्छं तवाचेष्टितम् ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

राजन्‌, कौतुकी इन्द्र कुल्हाडों से जिनकी शाखाएँ कट गईं है ऐसे /ूँठ और अग्नि द्वारा जिनकी छप्पर आदि शाखाएँ नष्ट हो गई ऐसी मिट्टी की दीवार, जो एक दूसरे से दूर हैं -दोना मे वृष्टिसेक से अंकुर पैदा कर दोनों को खुली शिखावाले-से बनाकर वायु द्वारा मानों परस्पर बोधने के लिए इकट्ठा करता है