Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verses 34–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
शिखरिणां करिणां कुसुमोत्करो विटपिषु स्फुटरोमसु राजते ।
गगनविच्युततारकलीलया शिखरमेष तुषारसमानया ॥ ३४ ॥
मीनावलीसरभसप्लुतिघट्टिताम्बुवीचीविलोलविरुवत्कुररीकराला ।
कावेर्यहो कुसुमशुक्लपटाऽवभाति निःशङ्करङ्कुकुलसंकुलकूलकच्छा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, इस पूर्वसागर के तटरूप निचली भूमि में कासे के कड़े पहनी हुई बड़े-बड़े पत्ते रूपी
वस्त्रवाली शबरस्त्रियाँ, जो नवीन मदरूप आसव को पैदा करनेवाले यौवन से युक्त हैं, देखिये कैसे
चल रही हे