Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
गीतं श्रृङ्गतरूच्चपल्लवपुटे निःश्वस्य सोत्कण्ठया कंठाश्लिष्टगिरा वियोगहतया विद्याधराणां स्त्रिया ।
यन्नामात्र तदेष नाथ पथिकः सोच्छ्वासमाकर्णयन् दोलान्दोलनयेव चञ्चलधिया नो याति नोनूच्यते ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
ये पर्वत-शिखर के वायु कहींपर फूलों की सुगन्धि
से भरे हैं तो कहीं पर विविध कमलो की भीनी-भीनी गन्धवाले हैं, कहींपर सुन्दर केसरराशि से लदे
हैं तो कहींपर बर्फ से सफेद हैं और कहींपर हरे, पीले और काले पर्वतीय धातुओं से हरे, पीले ओर
काले रंग के हैं । ये सुरत में क्लान्त लोगों के स्वेदविन्दुओं को दूर करते हुए बह रहे हैं