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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

अस्याः प्राग्भवसत्पतिः स मुनिना शापेन वृक्षीकृतो वर्षद्वादशकं तदेव गणयन्त्येषैव सात्र स्थिता । गायत्युत्कलिता तदेव दयितं तं पादपं संश्रिता मार्गे मार्गविहारिणां वदनतो राजन्ममैतच्छ्रुतम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

पुरुषरूप (संगम द्वारा आस्वादनीय) रसायन में अतृप्त अतएव मदवश लज्जारहित महिला द्वारा शरीर से आलिगित पुरुष की सुरत की समाप्ति के लिए आवश्यक अन्यान्य कार्य वर्णन रूप वंचनोक्ति विषविमूर्च्छना से हुई अपनी मृत्यु के समान नहीं सही जाती है