Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
कूजन्निर्जरवारयः परिसरत्प्रोन्निद्रतालद्रुमा हेलोल्लासितपुष्पपल्लववलद्वल्लीवितानाम्बराः ।
पर्यन्तोन्नतसाललम्बिजलदा रम्या गिरिग्रामकाश्चन्द्राश्वत्थमितावनिं शशिपुरस्योद्यानभागा इव ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
भुवनरूपी भवन के प्राकार (प्राचीर) रूप उदयाचल पर्वत के शिखरपर चन्द्रमारूपी
मांगलिक फूल मंगलसूचक होने से अमंगल से भयभीत हो चारों ओर कान्ति से विकसित हुआ । उस
प्रकार के मंगलमय फूल के समीप भी अमंगलकारी विधि द्वारा प्रेरित हुआ कलंकरूपी भ्रमर प्राप्त
हो ही गया । ऐसी परिस्थिति में इस भुवन में ऐसी श्रेष्ठ वस्तु कोई भी नहीं है, जिसे कलमुँहा विधि
क्षणभर में कलंकित न कर दे । भाव यह कि पृथ्वी का स्पर्श न कर पर्वतशिखराकाश में चलने वाले
चन्द्रमा की जब यह दशा है, तब और की तो कथा ही क्या है ?