Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
हतान्हतानभिमुखान्वीरान्वीरैः सहस्रशः ।
आरोप्यारोप्य खं यान्ति पश्य पश्याङ्गनारथैः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त ऊँचे भी पर्वत दूर से दिखाई देने के कारण बहुत छोटे मालूम होते हैं ऐसा कहते हैं /
महाराज, देखिये, हिमालय, मलयाचल, विन्ध्याचल, सहाद्रि, क्रौंचाद्रि, महेन्द्र, मधु, मन्दर,
दर्दुर आदि ये सफेद मेघरूपी वस्त्रं से ढके हुए पर्वत दूर होने के कारण दर्शकों की दृष्टि में सुखे हुए
पत्तों से वेष्टित ढेलों की रूपरेखा को धारण करते हैं