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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

हरिणीरावरम्येषु हारिहारीतहारिषु । गिरिग्रामेषु पुष्पेषुपुरेष्विव रतिर्नृणाम् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश में पूर्ण चन्द्रमा तभी तक शोभा पाता है जबतक कि वधू का मुँह घर के बाहर खुले आँगन में नहीं आता। घर के बाहर के ओंगनरूपी आकाश में वधूमुखरूपी चन्द्रमा के उदित होने पर तो उसकी सुन्दरता के सामने फीके पड़े चन्द्रमा ओर सफेद बादल के टुकड़े में कोई अन्तर नहीं रह जाता है