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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अह्नि प्रकाशमसि रक्तवपुर्दिनान्ते यामासु कृष्णमथ चाखिलवस्तुरिक्तम् । नित्यं न किंचिदपि सद्वहसीति मायां न व्योम वेत्ति विदुषोऽपि विचेष्टितं ते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार रत्नों की भी विभिन्‍न आयारें में (खानो में) उत्पत्ति और विभिन्न गृण और कार्य्रिद्धि रनशाख्र में प्रभिद्ध हैः यह कहते हैं / हे प्रभो, पर्वत में, सागर में, पुरुष में, पृथिवी में, मेघ में, मेढक में, पत्थर में और हाथी में विविध आकारवाली मणियाँ होती हैं कृपया आप उनके काम सुनिये, संतापनिवृत्ति, शत्रुओं का उच्चाटन, मारण, ज्वर, भीति, भ्रान्ति, अन्धता, खेद, उत्तापन तथा अपने स्वामी के प्रति व्यवहित (छिपी हुई) तथा दूरस्थित वस्तुओं को प्रकाशित करना, दूर गमन की शक्ति पैदा करना या भूमि में छिपकर गमनशक्ति, आकाशगति उत्पन्न करना, अतीत और भविष्य को दिखाना, रोग तथा दुर्भिक्ष का शमन करना, दूसरों द्वारा प्रयुक्त विष, कृत्या, यन्त्र, मन्त्र आदि का प्रतीकार करना आदि